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सांड की व्यथा

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 हम युवाओं की तरह आज कल सांड भी बेरोजगार घूम रहे है,हम तो फिर भी अपनी बेरोजगारी को कमरे के एक कोने में झेल ले रहे है परन्तु सांड गलियों,चौराहों,सड़कों व दुकानों के सामने किनारे खड़ी द्विपहिया वाहन पर ही चढ़ के अपने अंदर की अश्लीलता निकाल रहे है, परिणाम कुछ यूं हुआ है कि अनगिनत वाहनों के बत्ती, बगल की बत्ती, व बगल के शीशे सांड के चढ़ने से टूट जा रहे है यही नहीं कहीं - कहीं तो सांड स्वयं सांड के ऊपर चढ़ता हुआ नजर आ जाता है,,,.. अब आखिर बेचारे ये सांड करे भी तो क्या करे आज के इस दौर में विज्ञान ने इतना प्रगति कर लिया है कि अच्छी नस्ल व बछिया की प्राप्ति के लिए गायो को वैज्ञानिक तकनीकी से प्रजनन कर दिया जा रहा है,,, जो आपके नजरिए से तो सही परन्तु एक सांड के नजरिए से उनके ज़िन्दगी का एक अमूल्य उम्र उनसे छीन लिया जा रहा है,। आप स्वयं ही विचार कीजिए "अगर मनुष्यो के साथ भी ऐसा होने लगेगा तो आप क्या करेंगे??                           खैर भगवान ने आपको दो हाथ भी दिए है ...

स्वार्थी लोग

 लोग करना नहीं करवाना चाहते है, बिन मेहनत मूहं में निवाला चाहते हैं। शिवम् ✍️

💪जोश 💪

होंगी रास्तों में हजार कठिनाइयां तो क्या हुआ, यूं तो आसान पेट से बाहर निकलना भी नहीं था... शिवम् ✍️

😔बदलते रिश्ते😔

कभी पड़ोसी भी घर का हिस्सा हुए करते थे,आज घर के अन्य कमरे ही पड़ोसी सा महसूस होते है... शिवम् ✍️

तड़प

  आंखे नींद तरसती रही, उनके चेहरे ने पलकों को झपकने ना दिया...

प्रकृति और मृत्यु

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ऋतुवे कोई भी हो सुबह उगते सूरज की लालिमा देखते बनती है,कभी - कभी तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम स्वर्ग के वासी हो,और है भी अगर दुनिया में बेहद बुद्धिमान कहे जाने वाले प्राणी (मनुष्य) द्वारा कोई चिंता का विषय ना पैदा किया जाय तो। सूरज स्वयं ही हमारे जीवन को परिभाषित करता है बस हमे समझने की जरूरत है। अब चाहे जीवन की बात की जाय या जीवन व्यतीत करने की या फिर मृत्यु की ही क्यों ना की जाय, सब सूरज के उगने से अस्त होने तक से सीखा जा सकता है।               सूरज का उगना हमारे जन्म को, सूरज का तेज हमारे कठिन परिश्रम को,सूरज का बादल से ढक जाना हमारे कठिन परिस्थितियों को,शाम की लालिमा हमारे सफलता को,और आखिरी में डूब जाना हमारी मृत्यु को दर्शाता है।                                                 ...

रोबोट और मां

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निर्मला जी की पती को गुजरे आज पूरे २ माह बीत गए है, अब बेचारी 3 कमरे के इस मकान में अकेले ही रहती है। पति बिजली विभाग में सरकारी कर्मचारी थे जिसके कारण निर्मला जी को सरकारी भत्ते के रूप में १५००० रुपए प्रति महीने मिल जाता है उसिसे उनका खर्च चल जाया करता है। कास इन्होंने मेरे बेटे को इतना लाड प्यार ना किया होता और उसे पढ़ने लिखने के लिए विदेश ना भेजा होता तो आज वो हमारे पास ही होता और कम से कम मेरे बुढ़ापे कि लाठी तो बनता, अपना तो पहले ही दुनिया छोड़ के चले गए अब मै इस ८० वर्ष की उम्र में क्या - क्या करूंगी,,,,, और मै भी मर गई तो पता नहीं मेरे शरीर को कोई आग भी लगाने आयेगा कि नहीं........,मै मना करती थी  -- मत भेजो बेटे को इतना दूर लेकिन नहीं मेरी सुनते कहा थे,, इतना सोचते निर्मला जी की आंखो के आंसू आ गए थे...और कब उन्हें निद्रा आ गई पता भी नहीं चला....। अगले ही सुबह दरवाजे की घंटी बजती है,, डिंग डांग डिंग डांग डिंग डांग,, निर्मला - कौन ?? (आंख से कीचड़ निकालते हुए) डिंग डांग डिंग डांग निर्मला अरे कौन है बेटा बार घंटी बजाए जा रहे हो आ रही हूं ना,(दरवाजा खोलते हुए) डिलिवरी मैन - जी म...