प्रकृति और मृत्यु

ऋतुवे कोई भी हो सुबह उगते सूरज की लालिमा देखते बनती है,कभी - कभी तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम स्वर्ग के वासी हो,और है भी अगर दुनिया में बेहद बुद्धिमान कहे जाने वाले प्राणी (मनुष्य) द्वारा कोई चिंता का विषय ना पैदा किया जाय तो।

सूरज स्वयं ही हमारे जीवन को परिभाषित करता है बस हमे समझने की जरूरत है। अब चाहे जीवन की बात की जाय या जीवन व्यतीत करने की या फिर मृत्यु की ही क्यों ना की जाय, सब सूरज के उगने से अस्त होने तक से सीखा जा सकता है।
              सूरज का उगना हमारे जन्म को, सूरज का तेज हमारे कठिन परिश्रम को,सूरज का बादल से ढक जाना हमारे कठिन परिस्थितियों को,शाम की लालिमा हमारे सफलता को,और आखिरी में डूब जाना हमारी मृत्यु को दर्शाता है।
                                                              प्रकृति में उपस्थित सूरज मात्र से ही जीवन से मृत्यु को समझा जा सकता है परन्तु जीवन में खुशियों के रंग तो अन्य प्राकृतिक घटक जैसे - झरनों से जल का प्रवाह,पुष्पो लताओ इत्यादि पर भ्रमरो रंग बिरंगी तीतलियों का मंडराना,पक्षियों का चहेकना,कोयल की मधुर आवाज, मोर का नृत्य,ये सभी प्राकृतिक उपहार पृथ्वी को स्वर्ग जैसा सजोए रखती है या फिर ये कथन गलत नहीं होगा कि हमारा जन्म पृथ्वी रूपी स्वर्ग में हुआ है।
                                       परन्तु कभी कभी प्रकृति का एक दृश्य मन को दूख से व्याकुल कर देता है, जब परितंत्र की कोई घटना हमारे सामने घटित होती है। जरा सोचिए कि आप किसी नदी के तट पर बैठकर प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद ले रहे हो तत्पश्चात कुमुदिनी के पुष्प पर मंडराती तितली को मेंढक एक झटके पे गपक गया ऐसा कृत देख के गुस्सा आना स्वाभाविक है। कुछ ही क्षणों के पश्चात एक सर्प आया और मेंढक को निगल गया, अब आप सोच ही रहे होंगे कि बहुत अच्छा हुआ,आप प्रफुल्लित थे सहसा एक गिद्ध आ टपका जो सर्प को ले उड़ा।
अब आपकी खुशियां खामोशी एवम् भय के बादलों में परिवर्तित हो गई होगी।
जी हां प्रकृति भी खुद को सुंदर बनाए रखने के लिए मृत्यु की रचना की है

बस यही परितंत्र हमे प्रकृति से बांधे रखती है,और हा प्रकृति तो सुंदर है ही बस इन घटनाओं को भी खुशी खुशी ग्रहण करते रहिए।
(मृत्यु एक अटल सत्य है)



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