रोबोट और मां
निर्मला जी की पती को गुजरे आज पूरे २ माह बीत गए है, अब बेचारी 3 कमरे के इस मकान में अकेले ही रहती है। पति बिजली विभाग में सरकारी कर्मचारी थे जिसके कारण निर्मला जी को सरकारी भत्ते के रूप में १५००० रुपए प्रति महीने मिल जाता है उसिसे उनका खर्च चल जाया करता है।
कास इन्होंने मेरे बेटे को इतना लाड प्यार ना किया होता और उसे पढ़ने लिखने के लिए विदेश ना भेजा होता तो आज वो हमारे पास ही होता और कम से कम मेरे बुढ़ापे कि लाठी तो बनता, अपना तो पहले ही दुनिया छोड़ के चले गए अब मै इस ८० वर्ष की उम्र में क्या - क्या करूंगी,,,,, और मै भी मर गई तो पता नहीं मेरे शरीर को कोई आग भी लगाने आयेगा कि नहीं........,मै मना करती थी -- मत भेजो बेटे को इतना दूर लेकिन नहीं मेरी सुनते कहा थे,, इतना सोचते निर्मला जी की आंखो के आंसू आ गए थे...और कब उन्हें निद्रा आ गई पता भी नहीं चला....।
अगले ही सुबह दरवाजे की घंटी बजती है,,
डिंग डांग डिंग डांग डिंग डांग,,
निर्मला - कौन ?? (आंख से कीचड़ निकालते हुए)
डिंग डांग डिंग डांग
निर्मला अरे कौन है बेटा बार घंटी बजाए जा रहे हो आ रही हूं ना,(दरवाजा खोलते हुए)
डिलिवरी मैन - जी माफ कीजिएगा ये आपका पार्सल है, यहां हस्ताक्षर कर दीजिए।
निर्मला - इतना बड़ा पार्सल! कोई इंसान बन्द करके लाए हो क्या बेटा?
डिलिवरी मैन - अरे दादी जल्दी हस्ताक्षर कीजिए मुझे जाना है बहुत देर हो रही है, उसमे एक पत्र आप पढ़ लीजिएगा आपको सब समझ आ जाएगा....
निर्मला - ठीक है बेटा करती ला इधर कहा करना है,,
डिलिवरी मैन - अच्छा दादी चलता हूं,,।
निर्मला - अरे इसे अंदर तो करवा दो बेटा,,अरे सुनो,,...आज कल के बच्चे तो बड़ों की कदर ही नहीं करते,,..जब मेरा बेटा खुद मुझे झांकने तक नहीं आया और मै किसी और को बोल रही हूं, मै भी ना पागल हू.. हे ईश्वर सबको सदबुद्घि देना...प
पता नहीं क्या कबाहत है इतने बड़े कार्टून में लाओ पहले पत्र ही पढ़ती हूं.....,अरे ये तो मेरे पति का पत्र है ,(मन एकदम खुश था जैसे पति वापस उनके पास ही हो)
प्रिय निर्मला
अगर तुम ये पत्र पढ़ रही हो तो इसका मतलब मेरा रोबोट (पार्सल) तुम्हे मिल गया है, मै जानता हूं कि सुरेश(निर्मला का बेटा) वापस नहीं आयेगा,अरे अगर आना होता तो वो हरामखोर अब तक वापस आ चुका होता,,,कहीं ना कहीं सुरेश को बिगाड़ने में मेरा भी हाथ है आज हमारे साथ रहता तो उसको हमसे लगाव रहता लेकिन मैने ही उसे अपनो से दूर रखा,,, खैर छोड़ो,! तुम्हे याद है कि नहीं जब मै जापान से वापस आया था तो तुम मुझसे पूछी थी कि मेरे लिए क्या लाए और मैने तुमसे कहा था, मै तुम्हारे लिए एक उपहार लेके रखा हू समय आने पर दूंगा,।मेरी अचानक तबीयत खराब हो गई,मै बोला था डिलिवरी वालो को कि जल्दी डिलिवरी दे लेकिन उन्होंने बोला अभी समय लगेगा," मै चाहता था ये पार्सल तुम्हे मेरे जीते जी ही मिले लेकिन शायद इश्वर कुछ और चाहते थे,।
ये जो पार्सल है ना इसमें एक रोबोट है जो बिल्कुल बेटे की तरह तुम्हारा ख्याल रखेगा और तुम्हारे घर के सारे काम में भी हाथ बटाएगा बस तुम्हे उसके गले पर लगे लाल बटन को दबाना होगा,और हा अगर वो काम करना बंद कर दे तो उसके सिन्हा में बाई ओर बैटरी लगती है उसे बदल देना वो काम करने लगेगा,।
तुम्हारा हृदय
पुजारी शर्मा
आंखो में आंसू लिए निर्मला तुरंत पार्सल की ओर दौड़ी,पार्सल खोंलने के बाद दुखी हो जाती है,,,कुछ भी है,है तो मशीन का खिलौना ही, ये कौन सा मेरे बेटे की कमी पूरी करेगा,,,....चलो बटन दबा ही देती (निर्मला विचार करते हुए),,,
रोबोट - मम्मी जी प्रणाम(एकदम मधुर स्वर में)
निर्मला - प्रणाम वाणाम छोड़ो जल्दी जल्दी चाय बना दो मै मुंह धूल के आती हूं,।
रोबोट - जी मम्मी दो मिनट कहते हुए रासोई घर में जाता है और चाय के साथ साथ नाश्ता भी बनाकर लता है।
निर्मला - अरे वाह, चलो अब कल के बर्तन धूल दो,फिर बिस्तर लगा देना उसके बाद घर की सफाई करनी है।,,,,
रोबोट - जी मम्मी,
निर्मला रोबोट से कोई भी काम बोलती वो तुरन्त कर देता था,,,
निर्मला - जो है सो है मै आज बिल्कुल भी थकान महेसुस नहीं कर रही और ये सब मेरे पति के कारण हुआ है ,कास मै उन्हें धन्यवाद कह पाती।
रोबोट निर्मला का लड़का तो नहीं लेकिन एक लड़का और लड़की दोनों की तरह उसका ख्याल रखता था,,,,निर्मला खाती तो उसके सामने बैठ के देखता रहता,वो टीवी देखती तो वो भी टीवी देखता,वो सोती तो उसका पैर दबाता,वो जब सो जाती तो उसको चादर उढाकर,पूरी रात वहीं बैठा रहता .......
निर्मला अब रोबोट को अपना बेटा ही मानने लगी थी और तो और रोबोट का नाम भी उसने अपने बेटे के नाम ले सुरेश रख दिया था, बहुत अच्छा लगाव भी हो गया था,,।
समय बीतता गया एक दिन निर्मला कुर्सी पर बैठे खाना खा रही थी कि अचानक रोबोट वहीं गिर पड़ा।
निर्मला - अरे क्या हो गया,,,, बेटा उठो उठो अरे बोलते क्यू नही,,
उर्मिला रोबोट को पुकारते पुकारते रोने लगी लेकिन रोबोट भला क्या उठने क्या नाम ले, तभी उसे अपने पति की लिखी हुई पत्र की बात याद आ गई,
निर्मला - बैटरी हा बैटरी बेटा रुको मै लेके आती हूं ,अलमारी में तो रखा था नहीं मिल रहा है, हे ईश्वर कहा रख दिया, बेटा सुरेश रुको मै बाहर से लेकर आती हूं,,।
निर्मला ऐसी परेशान थी जैसे उसका बेटा सुरेश कोमा में हो,,,,,
वो दौड़कर आ रही थी बाजार में सब देख कर आश्चर्य थे कि के ८१ साल की बुढ़िया इतना तेज कैसे दौड़ रही है,आखिर क्यों नए दौड़ती एक बेटा तो कभी पूछने नहीं आया था अब जब एक बेटा पाई है तो उसे कैसे खो सकती थी,,,।
निर्मला - हा बेटा सुरेश देखो मै आ गई ,,ये लगा दिया,,,, रोबोट तुरंत खड़ा हो गया,।
रोबोट - मम्मी प्रणाम ,कैसी है आप, आपने खाना क्या की नहीं खाया?
निर्मला रोती हुई रोबोट के गले चिपक गई, अभी तक तो नहीं खाई हूं सुरेश लेकिन अब तुम आ उठ गए हो ना तो मेरी पेट बस देख के है भर गई,,, तुम हमेशा साथ रहना कहीं मत जाना मुझे छोड़कर,, कहते हुए निर्मला और तेजी से रोने लगी,।
रोबोट - मै कहीं नहीं जा रहा मम्मी जी ,और वो भी निर्मला को गले से लगा लिया ,।
उसी दिन निर्मला बाज़ार से बहुत सारी बैटरी खरीद लाई, समय बीतता गया अब जब भी रोबोट की बैटरी खत्म होती निर्मला उसे बदल देती अब निर्मला को कोई भय भी नहीं रहता था,, निर्मला के भी अंग अब बहुत कमजोर पड़ रहे थे आखिर वो भी ८९ वर्ष की हो गई थी,,।
एक दिन की बात है जब निर्मला खाना खा के आई और बिस्तर पर लेट गई ,,
निर्मला - अरे बेटा सुरेश जरा मेरे आंख में दवा डाल देना,।
रोबोट - जी मम्मी,,,, आंख खोलो मम्मी ,मम्मी सुन क्यू नहीं रही आंख खोलिए, मम्मी.....,लगता है मम्मी का बैटरी खत्म हो गया,,,मम्मी रुको आता हूं ,,
रोबोट बैटरी ले आया और निर्मला के कपड़े के जेब में डाल दिया,,
रोबोट - उठो न मम्मी ,मै दवा भी लेके आया हूं ,आंख खोलो डाल दूं,,,,मम्मी,,,,, उठो ना,....
निर्मला गहरी नींद सो चुकी थी, (उसके चेहरे पर एक अलग ही खुशी झलक रही थी मानो उसके मन की सारी इच्छा पूरी हो गई हो और क्यों नहीं होती आखिर उसको बेटे का प्यार जो मिला था), अब वो कहा उठने वाली,,......रोबोट २ दिन तक ऐसे ही,- मम्मी,,,उठो ना मम्मी,,,,उठो दवा लेके आया हूं आंख खोलो डाल दूं रटता रहा,, तीसरे दिन उसकी भी बैटरी खत्म हो गई और दोनों एक ही बिस्तर पर लेटे रहे.,एक रोबोट ने एक मां को ममता जताने का अवसर दिया और खुद बेटे का प्यार भी देता रहा।।।

बहुत ख़ूब
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